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बड़ी खबर : छत्तीसगढ़ में लागू होगा समान नागरिक संहिता कानून, सरकार ने बनाई समिति, न्यायिक सुधारों की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल : संजय श्रीवास्तव

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में हुई आज केबिनेट की बैठक में प्रदेश में यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) लागू करने का महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। इस निर्णय का छत्तीसगढ़ राज्य नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष संजय श्रीवास्तव ने पूर्ण समर्थन करते हुए इसे न्यायिक सुधारों की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल बताया है।

श्रीवास्तव ने कहा कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न राज्यों में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण, भरण-पोषण एवं पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धर्मों के अनुसार अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू हैं। इस व्यवस्था के कारण न केवल वैधानिक प्रक्रियाओं में असमानता उत्पन्न होती है, बल्कि आम नागरिकों के लिए न्याय प्राप्त करना जटिल एवं समयसाध्य हो जाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है, जो सामाजिक न्याय, समानता एवं एकरूपता की भावना को सशक्त करता है।

उन्होंने आगे कहा कि भारतीय जनता पार्टी सदैव “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के मूल मंत्र पर कार्य करती रही है। समान नागरिक संहिता लागू होने से समाज में धार्मिक एवं लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा तथा महिलाओं को विशेष रूप से न्याय और अधिकारों की दृष्टि से सशक्त बनाया जा सकेगा। यह कानून महिलाओं, बच्चों एवं कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

जानते चलें कि समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार प्रारूप को विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत अनुमोदन प्राप्त कर विधानसभा में प्रस्तुत किया जाएगा, जिससे छत्तीसगढ़ में एक समान, पारदर्शी एवं न्यायपूर्ण नागरिक कानून व्यवस्था स्थापित होगी। यह निर्णय प्रदेश में सामाजिक समरसता, समान अधिकार और न्याय के नए युग की शुरुआत करेगा।

किन राज्यों में लागू है

समान नागरिक संहिता कानून अब तक गुजरात, गोवा और उत्तराखण्ड में लागू हो चुका है और अब इसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल हो गया है।
गुजरात और उत्तराखंड दोनों के यूसीसी मॉडल में संपत्ति के अधिकारों पर विशेष जोर दिया गया है. गुजरात के नए कानून के मुताबिक, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु बिना वसीयत किए हो जाती है, तो उसकी संपत्ति पर उसके माता-पिता, पति या पत्नी और बच्चों का बराबर हक होगा. पहले के कई व्यक्तिगत कानूनों में बेटियों या माता-पिता के हक को लेकर असमानताएं थीं, जिन्हें अब खत्म कर दिया गया है. अब बेटा हो या बेटी, पैतृक संपत्ति में सभी को समान हिस्सेदार माना जाएगा, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव है.

लिव-इन रिलेशनशिप के लिए कड़े पंजीकरण नियम

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर गुजरात सरकार ने बेहद सख्त रुख अपनाया है. नए नियमों के तहत अब लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को अपना पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा. यदि पार्टनर की उम्र 21 वर्ष से कम है, तो इस बात की जानकारी उनके अभिभावकों को देना जरूरी कर दिया गया है. पंजीकरण की यह प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी. यदि कोई जोड़ा बिना रजिस्ट्रेशन के एक महीने से ज्यादा समय तक साथ रहता है, तो उन्हें 3 महीने की जेल या 10 हजार रुपये तक का जुर्माना भुगतना पड़ सकता है. यह नियम सामाजिक सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है.

लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को कानूनी सुरक्षा

कानून में लिव-इन संबंधों से पैदा होने वाले बच्चों के भविष्य का भी पूरा ध्यान रखा गया है. गुजरात यूसीसी के तहत ऐसे बच्चों को पूरी तरह वैध माना जाएगा और उन्हें वे सभी अधिकार मिलेंगे जो एक विवाहित जोड़े के बच्चों को मिलते हैं. यदि लिव-इन रिलेशनशिप टूटता है और महिला को अकेला छोड़ दिया जाता है, तो वह कानूनी तौर पर अपने पार्टनर से भरण-पोषण (Maintenance) की हकदार होगी. इसके अलावा, बच्चे की पूरी जिम्मेदारी माता-पिता दोनों की होगी और उन्हें बच्चे को अपना नाम देना अनिवार्य होगा.

तलाक की प्रक्रिया और व्यक्तिगत कानूनों का अंत

गुजरात में अब किसी भी व्यक्तिगत या प्रथागत कानून के आधार पर दिया गया तलाक मान्य नहीं होगा. अब तलाक के लिए केवल अदालत का दरवाजा खटखटाना होगा. क्रूरता, धर्म परिवर्तन, मानसिक बीमारी या लंबे समय तक जीवनसाथी के लापता होने जैसे ठोस आधारों पर ही तलाक मिल सकेगा. यदि पति-पत्नी एक साल से अलग रह रहे हैं, तो वे आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दे सकते हैं. अदालत के फैसले के 60 दिनों के भीतर इसे रजिस्ट्रार के पास दर्ज कराना अनिवार्य होगा. यह व्यवस्था तलाक की प्रक्रिया को पारदर्शी और न्यायसंगत बनाएगी.

अब नहीं चलेगा हलाला और इद्दत

उत्तराखंड की तर्ज पर गुजरात के यूसीसी में भी बहु-विवाह, हलाला और इद्दत जैसी प्रथाओं पर कड़ा प्रहार किया गया है. अब राज्य में कोई भी व्यक्ति एक से अधिक विवाह नहीं कर सकेगा, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो. हलाला जैसी प्रथाओं को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है. विवाह और तलाक के नियम अब धर्म के बजाय देश के कानून से संचालित होंगे. विवाह का पंजीकरण भी अब अनिवार्य होगा, जिससे धोखाधड़ी और कानूनी विवादों में कमी आने की उम्मीद है.

कहां के नियम-कानून ज्यादा सख्त?

उत्तराखंड और गुजरात ने समान नागरिक संहिता (UCC) के जरिए सामाजिक अनुशासन की नई और बेहद सख्त परिभाषा लिखी है. इन दोनों राज्यों में अब निजी जीवन के फैसले केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि कानूनी जवाबदेही के दायरे में हैं. उत्तराखंड ने लिव-इन जोड़ों के लिए अनिवार्य पंजीकरण और पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हक देकर कड़ा रुख अपनाया, तो वहीं गुजरात ने 2026 में विवाह और तलाक के पारंपरिक रास्तों को बंद कर अदालती नियमों को अनिवार्य बना दिया है. बिना रजिस्ट्रेशन लिव-इन में रहना अब सीधे जेल की सजा और भारी जुर्माने को बुलावा देना है, जो इन कानूनों की सख्ती को साफ दर्शाता है. ऐसे में दोनों राज्यों में कानून बिल्कुल सख्त हैं.

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