Blog

16 साल बाद टूटी प्रशासनिक दूरी, ताड़मेटला तक पहुंचने वाले अमित कुमार पहले कलेक्टर

बिगुल
ताड़मेटला… एक ऐसा नाम, जो साल 2010 में देश के सबसे बड़े नक्सल हमले के बाद सुर्खियों में आया था. 76 जवानों की शहादत के बावजूद यह गांव वर्षों तक प्रशासनिक उपेक्षा का प्रतीक बना रहा. नक्सल प्रभाव, सुरक्षा चुनौतियां और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां, इन सबके बीच ताड़मेटला जैसे संवेदनशील इलाके तक शासन-प्रशासन की पहुंच लगभग शून्य ही रही.

हमले के बाद 2011 में ताड़मेटला, तिम्मापुरम और मोरपल्ली में आगजनी की घटनाएं भी सामने आईं. उस समय पुलिस पर ही ग्रामीणों के घर जलाने के आरोप लगे थे. हालात इतने संवेदनशील थे कि तत्कालीन अविभाजित दंतेवाड़ा कलेक्टर आर प्रसन्ना और बस्तर कमिश्नर श्रीनिवासलु राहत सामग्री लेकर केवल चिंतागुफा तक ही पहुंच सके. वहां से आगे ताड़मेटला तक राहत पहुंचाने की जिम्मेदारी उस समय के सुकमा एसडीएम एसपी वैद्य के नेतृत्व में निभाई गई.

सुरक्षा बल भी केवल ऑपरेशन और सर्चिंग के दौरान पहुंचे

दरअसल, उस दौर में पूरा इलाका माओवादी प्रभाव के चरम पर था. जनताना सरकार की मजबूत पकड़ और सुरक्षा जोखिमों के चलते प्रशासनिक पहुंच लगभग ठप थी. वर्षों तक स्थिति ऐसी बनी रही कि पटवारी, सचिव और शिक्षक जैसे सीमित कर्मचारी ही किसी तरह यहां तक पहुंच पाते थे. बाकी अधिकारी और अमला इस क्षेत्र से दूर ही रहे. सुरक्षा बल भी यहां केवल ऑपरेशन या सर्चिंग के दौरान ही पहुंचे.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि देश-दुनिया में चर्चित होने के बावजूद ताड़मेटला जैसे गांव की सुध लेने में सिस्टम को इतना लंबा वक्त क्यों लगा? क्या यह केवल सुरक्षा का मामला था या फिर इच्छाशक्ति की कमी भी इसकी बड़ी वजह रही?

कलेक्टर का पहुंचना बदलाव का बड़ा कदम

अब, करीब डेढ़ दशक बाद पहली बार सुकमा कलेक्टर अमित कुमार का ताड़मेटला पहुंचना सिर्फ एक प्रशासनिक दौरा नहीं, बल्कि बदलाव की ओर बढ़ता एक नया कदम भी है. यह उस दूरी के टूटने का संकेत है, जो वर्षों से शासन और गांव के बीच बनी हुई थी.

कलेक्टर अमित कुमार ने न सिर्फ गांव पहुंचकर ग्रामीणों से सीधा संवाद किया, बल्कि उनकी समस्याएं सुनीं और समाधान की पहल भी की. यह कदम उन उम्मीदों को फिर से जिंदा करता है, जो कभी इस क्षेत्र ने शासन से लगाई थीं.

ताड़मेटला तक पहुंचना इतिहास जरूर है, लेकिन इस इतिहास को बदलाव की कहानी में बदलना ही प्रशासन की असली परीक्षा होगी.

The Bigul

हमारा आग्रह : एक निष्पक्ष, स्वतंत्र, साहसी और सवाल पूछती पत्रकारिता के लिए हम आपके सहयोग के हकदार हैं. कृपया हमारी आर्थिक मदद करें. आपका सहयोग 'द बिगुल' के लिए संजीवनी साबित होगा.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button