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गौ आधारित खेती की पाठशाला, किसानों को सिखाए गोबर-गौमूत्र से जैविक खेती के तरीके

बिगुल
छत्तीसगढ़ में गौ संरक्षण को बढ़ावा देने के साथ ही अब गौवंश को खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की पहल की जा रही है। इसी उद्देश्य से राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में दो दिवसीय आवासीय गौ आधारित जैविक कृषि प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें किसानों को गोबर और गौमूत्र के इस्तेमाल से प्राकृतिक खेती करने के तरीके बताए गए। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष बिशेश्वर पटेल विशेष रूप से शामिल हुए।

गायों के संरक्षण के साथ उन्हें उपयोगी बनाने पर जोर
कार्यशाला के दौरान गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष बिशेश्वर पटेल ने कहा कि आयोग तीन प्रमुख उद्देश्यों को लेकर काम कर रहा है। इसमें गौवंश का संरक्षण, गायों को उपयोगी बनाना और इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आम लोगों तथा किसानों को प्रशिक्षित करना शामिल है।

उन्होंने बताया कि गौ आधारित खेती को बढ़ावा देकर किसानों को प्राकृतिक कृषि पद्धतियों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इससे खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने के साथ मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद मिल सकती है।

गोबर और गौमूत्र से तैयार होंगे खेती के विकल्प
दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसानों को गोबर और गौमूत्र के कृषि उपयोग की जानकारी दी गई। इसके साथ ही जैविक खाद तैयार करने, खेतों की उर्वरता बनाए रखने और भूमि के स्वास्थ्य को बेहतर करने से जुड़े तरीकों का प्रशिक्षण दिया गया।

कार्यशाला में किसानों को खेती में आत्मनिर्भर बनने का संदेश भी दिया गया। इसके लिए ‘स्वयं का बीज, स्वयं की खाद, स्वयं की दवाई, स्वयं का अनाज और स्वयं का बाजार’ की अवधारणा समझाई गई। इसका उद्देश्य किसानों को खेती के लिए जरूरी संसाधनों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने और पारंपरिक कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करना है।

खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ेगा गौवंश
आयोग की पहल का उद्देश्य गौ संरक्षण को केवल पशुओं की देखभाल तक सीमित नहीं रखना, बल्कि गौवंश को कृषि व्यवस्था और ग्रामीण आजीविका से भी जोड़ना है। इसके जरिए गौपालन को आर्थिक रूप से उपयोगी बनाने और किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूक करने पर जोर दिया जा रहा है।

डोंगरगढ़ में आयोजित यह कार्यशाला गौ संरक्षण, जैविक कृषि और किसान आत्मनिर्भरता को एक साथ जोड़ने की पहल है। अब यह देखना अहम होगा कि प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले किसान इन तरीकों को अपने खेतों में किस हद तक अपनाते हैं।

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