
बिगुल
2006 में केवल 4 देशों से शुरू हुआ ब्रिक्स आज ब्रिक्स पार्टनर्स समेत 21 देशों का परिवार बन चुका है। ब्रिक्स देश दुनिया की 50% आबादी, 40% GDP और 25% से अधिक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैश्विक GDP की तुलना में ब्रिक्स की संयुक्त GDP करीब दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने उदबोधन में कहा कि ‘भारत की अध्यक्षता में हमने सभी प्रयास ‘सतर्कता, नवाचार, सहयोग, स्थिरता’ इन चार स्तंभों पर क्रिएट किए हैं। मुझे खुशी है कि आप सभी के सहयोग और समर्थन से हम अपने साझा विजन को भिन्न-भिन्न सहयोग में बदल सके। आज विश्व में तनावों की संख्या लगातार बढ़ रही है और सामान्य मानवी के जीवन पर उसका बहुत ही नकारात्मक व व्यापक प्रभाव हो रहा है। महामारियां, जलवायु आपदा और सप्लाई चेन में रुकावट ने दिखाया है कि आज की आपस में जुड़ी दुनिया में कोई भी संकट एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इसलिए हमने ब्रिक्स समूह में रेजिलिएंस बढ़ाने पर विशेष बल दिया है। चुनौतियों को तुरंत पहचानना, उनके लिए तैयार होना और तुरंत कार्रवाई करना भी उतना ही आवश्यक है। इसी सोच के साथ इंफेक्शियस डिसीज के प्रिवेंशन(संक्रामक बीमारियों की रोकथाम) और रिस्पॉन्स के लिए ब्रिक्स इंटीग्रेटेड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम पर सहमति बनी है। डिजास्टर मैनेजमेंट के लिए अर्ली वॉर्निंग डेटा इंटिग्रिशन गाइडलाइन तैयार की गई है। ब्रिक्स लॉजिस्टिक्स सप्लाई चेन का ऑपरेशन फ्रेमवर्क हमारी सप्लाई चेन को अधिक रिलायबल और रेजिलियंट बनाने में सहायक होगा।’
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के सफल वैश्विक आयोजनों में एक और आयाम है।ब्रिक्स ऐसा ग़ैर यूरोपीय संगठन है जिसमें भारत अगुआ भूमिका में है।जबकि जी-२० और क्वॉर्ड में भारत सदस्य तो है पर इनमें पश्चिम का दबदबा है।वहीं एससीओ में चीन हावी है।ब्रिक्स की मजबूती भारतीय कूटनीति की कामयाबी है। ऐसा नहीं है कि आज से पहले भारत में कभी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नहीं हुआ। हुआ है, बिल्कुल हुआ है। लेकिन पहले जब भारत में यह सम्मेलन हुआ था तब भारत को ब्रिक्स की सबसे कमजोर कड़ी माना जाता था, आज नया भारत ब्रिक्स की ताकत बना है।
पश्चिम एशिया में टेंशन घटाने के लिए दिल्ली ने दिखाया रास्ता
6 महीने से होर्मुज के आसपास के क्षेत्र में तनाव है। ईरान पर अमेरिकी हमले और उसके बाद जोरदार पलटवार से कई देशों में माहौल तनावपूर्ण बन गया। इसमें यूएई भी शामिल था। अब दिल्ली में हुई ब्रिक्स समिट ने एक ऐसा मंच दे दिया है, जिसे सकारात्मक पहल माना जा रहा है। ईरान और यूएई के नेताओं ने आपस में बातचीत की है।
मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट की वरिष्ठ फेलो मीना सिंह रॉय कहती हैं कि जब तक खाड़ी में शांति नहीं होती है, तब तक एशिया समेत दुनिया भर के सप्लाई चेन, तेल, फर्टिलाइजर, खाद्यान्नों की आवाजाही पर असर पड़ेगा। इसका सीधा असर देशों के आर्थिक विकास पर होता है। भारत के लिए बहुत जरूरी बात है कि खाड़ी क्षेत्र में शांति बनी रहे और स्थिरता कायम हो। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद से ही पूरा खाड़ी क्षेत्र सुलग रहा है। यह हमारे हित में नहीं है।
“ब्रिक्स में मोदी का मैजिक ऐसा चला कि दुनिया के तमाम देशों के साथ साथ कांग्रेस के विदेश मामलों के जानकार भी भारत की भूमिका और दिल्ली डिक्लेरेशन का स्वागत कर रहे हैं :
डॉ. अनिल द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार.
अगर इस लिहाज से देखें तो यह भारत की डिप्लोमेसी की अचीवमेंट है। ईरान और यूएई के नेताओं का मिलना भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है संघर्ष शुरू होने के बाद पहली बार ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और यूएई से अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल-नाहयान के बीच बातचीत हुई है। इस बातचीत से कम से कम सकारात्मक बातचीत का माहौल तैयार हुआ है। बात हो रही है कि मिडिल ईस्ट की लड़ाई को कैसे मैनेज किया जाए, होर्मुज संकट का मुद्दा कैसे सुलझाया जाए।
इस बातचीत का क्रेडिट भारतीय डिप्लोमेसी को
दूसरी चीज ये है कि यूएई स्थित अमेरिकी बेसों पर ईरान की तरफ से भी कार्रवाई की गई थी। ईरान के नजरिए से देखें तो, यूएई अमेरिका और इजरायल के खेमे का माना जाता है। ऐसे में दोनों देशों के नेताओं के बीच हाई-लेवल मीटिंग भारत में हुई है। यह भारत की कूटनीति के लिए बड़ी सफलता है। इसका क्रेडिट भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार की डिप्लोमेसी को देना पड़ेगा।
मध्य-पूर्व की जो समस्याएं हैं, वो दो दिन में सॉल्व नहीं होने वाली हैं। लेकिन ये एक बहुत बड़ा कदम है कि दो देश, जिनके बीच घमासान युद्ध चल रहा था, मिसाइल अटैक हो रहे थे और दोनों एक-दूसरे को सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे थे, वो बातचीत की टेबल पर आए हैं।
मेरा हमेशा से ये मानना रहा है कि क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान उस क्षेत्र के देश ही ढूंढ पाएंगे। हूती, ईरान, सऊदी, यमन, यूएई… इन्हीं देशों को आपस में बैठकर अपनी समस्याएं सुलझानी होंगी।
अंत में मैं कहूंगी कि ब्रिक्स ग्लोबल साउथ का बहुत बड़ा इनिशिएटिव है और यहां ईरान-यूएई के बीच वार्ता एशिया के अच्छे भविष्य के लिए बेहतरीन कदम है।
मध्य-पूर्व मामलों के जानकार अतुल अनेजा कहते हैं अभी तक ईरान का यूएई और पूरे पर्शियन गल्फ के बाकी अरब देशों के बीच कोई तालमेल नहीं था। बल्कि दोनों पक्षों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा था। ईरान पर अमेरिकी हमले हो रहे थे फिर दुबई और अबू धाबी के अमेरिकी बेसों पर ईरान निशाना साध रहा था।
लेकिन अब अचानक दोनों पक्षों ने डायलॉग शुरू किया है। इस BRICS समिट के दौरान जब यूएई के प्रतिनिधि और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच बातचीत हुई है, उसमें भारत की बड़ी भूमिका रही है। BRICS समिट की भी बहुत बड़ी भूमिका रही है कि इनको बातचीत के रास्ते पर लाया गया है।
ब्रिक्स का दिल्ली घोषणापत्र – युद्ध, टैरिफ थोपने व आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर काम करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील को बड़ी भूमिका देने जैसे अनेकों मामलों में एक राय बनाना भारत की कुटनीतिज्ञ जीत के रूप में देखा जाएगा।
प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत रिश्ते यूएई के नेतृत्व के साथ बहुत अच्छे रहे हैं। ईरान की लीडरशिप को भारत में काफी सम्मान दिया गया, उन्हें काफी तवज्जो मिली। नेताओं की पर्सनल केमिस्ट्री भी बहुत मायने रखती हैं। अब हम एक कॉमन पॉइंट पर आ चुके हैं कि कैसे युद्ध से हटकर बातचीत से रिश्तों को आगे बढ़ाया जाए। अब यहां से युद्ध से हटकर शांति की तरफ जाने की पूरी कोशिश हो रही है।



