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मैं डरा नहीं…’, पूर्व नक्सली कमांडर पापाराव ने बताई सरेंडर करने के पीछे की कहानी

बिगुल
लंबे समय तक नक्सली संगठन की कमान संभालने वाले पूर्व नक्सली लीडर पापाराव अब सरेंडर कर मुख्यधारा में लौट आया है. बीते दिनों बीजापुर में आत्मसमर्पण करने वाले पापाराव का यह फैसला फोर्स के बढ़ते दबाव, कमजोर पड़ते नक्सल नेटवर्क की कहानी भी बयां करता है. इन्हीं सब मुद्दों को लेकर विस्तार न्यूज के संवाददाता ने पापाराव से खास बातचीत की.

लंबे समय तक नक्सली संगठन की कमान संभालने वाले पूर्व नक्सली लीडर पापाराव अब सरेंडर कर मुख्यधारा में लौट आया है. बीते दिनों बीजापुर में आत्मसमर्पण करने वाले पापाराव का यह फैसला फोर्स के बढ़ते दबाव, कमजोर पड़ते नक्सल नेटवर्क की कहानी भी बयां करता है. इन्हीं सब मुद्दों को लेकर विस्तार न्यूज के संवाददाता ने पापाराव से खास बातचीत की.

मैं डरा नहीं, रास्ता नहीं मिला तो सरेंडर किया – पापा राव
अपने सरेंडर के बारे में बताते हुए पापाराव ने कहा कि मैं डरा नहीं था. मेरे ज्यादातर साथियों ने सरेंडर कर दिया था. जिस इलाके में मैं सक्रिय था, वहां फोर्स के 18 कैंप खुल गए थे. जंगल में छिपने की जगह नहीं बची, इसलिए वापस आ गया. वहीं केंद्रीय कमेटी के सभी मेंबर्स ने सरेंडर कर दिया था. कोई रास्ता नहीं मिला तो हमने सरेंडर किया.

नक्सल संगठन में सबको नसबंदी कराना जरूरी
पापाराव ने बताया कि वह 1995 में नक्सल संगठन से जुड़ा था. उनका जन्म सुकमा के निम्मलगुड़ा में हुआ था. वहीं रमन्ना ने उनका नाम पापाराव रखा था. अपनी शादी के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी में आने से पहले शादी हुई थी. बच्चे बड़े हुए तो पत्नी को साथ लाया. 2007 में मुठभेड़ में पत्नी शहीद हुई. जगरगुंडा में मुठभेड़ में शहीद हुई. 2009 में उर्मिला से दूसरी शादी की. पामेड़ मुठभेड़ में वो भी शहीद हुई. उन्होंने बताया कि नक्सल संगठन में आप बच्चे नहीं कर सकते. सबको नसबंदी कराना जरूरी होता है.

सोनू और रुपेश के सरेंडर का किया था विरोध
पापाराव ने बताया कि उसने सोनू और रुपेश के सरेंडर का विरोध किया था. उन्होंने कहा कि हथियारबंद लड़ाई जारी रखना चाहता था. संगठन को आगे ले जाने की कोशिश की. फोर्स के कैंप खुलने से सरेंडर करना पड़ा. सशस्त्र लड़ाई को अब गलत मानता हूं.

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