सुकमा में जमीन और वन अधिकार को लेकर हजारों ग्रामीणों का प्रदर्शन, मनीष कुंजाम ने दी बड़े आंदोलन की चेतावनी

बिगुल
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में जमीन, जंगल और वन अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हजारों ग्रामीणों ने एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद की। बस्तरिया राज मोर्चा के आह्वान पर गुरुवार को हड़मा स्टेडियम में आयोजित विशाल जनसभा में सुकमा, छिंदगढ़ और कोंटा विकासखंड के ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हुए। ग्रामीणों ने राजस्व रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ी, वनाधिकार पट्टा, जमीन पर वास्तविक कब्जे का अधिकार और खरीफ फसल को हुए नुकसान जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। लंबे समय तक नक्सलवाद से प्रभावित रहे सुकमा जिले में बड़ी संख्या में ग्रामीणों का जिला मुख्यालय पहुंचकर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराना अहम माना जा रहा है। सभा में पूर्व विधायक और बस्तरिया राज मोर्चा के संयोजक मनीष कुंजाम भी मौजूद रहे।
जमीन और जंगल के अधिकार के लिए एकजुट हुए ग्रामीण
हड़मा स्टेडियम में आयोजित आमसभा के दौरान अलग-अलग गांवों से पहुंचे लोगों ने अपनी समस्याएं रखीं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कई परिवार वर्षों से जमीन पर खेती और निवास कर रहे हैं, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज नहीं होने के कारण उन्हें अपने अधिकार हासिल करने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
सभा में प्रमुख रूप से इन मुद्दों पर चर्चा हुई:
राजस्व अभिलेखों में दर्ज कथित गलत नामों को हटाना।
वास्तविक कब्जाधारी परिवारों को जमीन का मालिकाना हक देना।
मालिक मकबूजा जमीन से जुड़े विवादों का समाधान।
पात्र आदिवासी परिवारों को वनाधिकार पट्टा उपलब्ध कराना।
सामुदायिक वन संसाधनों पर ग्राम सभाओं का अधिकार सुनिश्चित करना।
खरीफ फसलों को हुए नुकसान का मुआवजा देना।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की कि इन समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाए, ताकि आदिवासी परिवारों को बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें।
राजस्व रिकॉर्ड में गड़बड़ी और संदिग्ध पट्टों की जांच की मांग
जनसभा के बाद बस्तरिया राज मोर्चा ने मुख्यमंत्री के नाम पांच सूत्रीय मांग पत्र कलेक्टर के माध्यम से प्रशासन को सौंपा। इसमें जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में कथित अनियमितताओं की जांच कर वास्तविक भूमि धारकों को उनका अधिकार दिलाने की मांग की गई। मोर्चा के अनुसार, कोंटा विकासखंड के मुकरम, दरभायूड़ा, चितलनार, चिमलीपेंटा, गगनपल्ली, बिरला, मानीकोंटा, भेजी, बण्डा, फंदीगुड़ा और केरलापेंदा समेत कई गांवों में हजारों एकड़ जमीन के रिकॉर्ड में अज्ञात व्यक्तियों के नाम दर्ज होने की शिकायत है। मोर्चा ने इन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच कराने, गलत प्रविष्टियों को दुरुस्त करने और वास्तविक रूप से जमीन पर काबिज आदिवासी परिवारों के नाम पट्टे जारी करने की मांग रखी।
पात्र आदिवासी परिवारों को 10 एकड़ तक वनाधिकार पट्टा देने की मांग
ग्रामीणों ने वनाधिकार मान्यता कानून के तहत पात्र परिवारों को नियमानुसार अधिकतम 10 एकड़ तक व्यक्तिगत वनाधिकार पट्टा देने की मांग उठाई। उनका कहना है कि वर्षों से जंगल और जमीन पर निर्भर रहने वाले परिवारों को कानूनी रूप से उनके अधिकार मिलने चाहिए।
इसके अलावा मालिक मकबूजा व्यवस्था के अंतर्गत पेड़ों की कटाई के नाम पर खरीदी गई जमीनों की जांच कराने की मांग भी ज्ञापन में शामिल की गई। मोर्चा ने वास्तविक भूमि स्वामियों को उनका अधिकार वापस दिलाने पर जोर दिया। साथ ही प्रत्येक ग्राम को सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पत्र जारी करने की मांग की गई। इससे ग्राम सभाएं अपनी पारंपरिक वन संपदा का संरक्षण, प्रबंधन और कानून के दायरे में उसका उपयोग कर सकेंगी।
फसल बर्बादी से प्रभावित किसानों के लिए मुआवजा और कर्ज माफी की मांग
आमसभा में किसानों की आर्थिक परेशानियों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। मोर्चा ने बताया कि इस वर्ष अपर्याप्त बारिश और बाद में आए तूफान व चक्रवाती मौसम के चलते खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचा है। इस स्थिति को देखते हुए पूरे सुकमा जिले को अकालग्रस्त घोषित करने की मांग की गई। ज्ञापन में प्रभावित क्षेत्रों में फसल क्षति का सर्वे कराने, किसानों को उचित मुआवजा देने और तत्काल राहत कार्य शुरू करने की बात कही गई। इसके अलावा आर्थिक संकट से जूझ रहे किसानों को राहत देने के लिए कृषि ऋण माफ करने की मांग भी प्रशासन के सामने रखी गई।
मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई तो होगा बड़ा आंदोलन: मनीष कुंजाम
सभा को संबोधित करते हुए पूर्व विधायक और बस्तरिया राज मोर्चा के संयोजक मनीष कुंजाम ने कहा कि हजारों ग्रामीणों की भागीदारी इस बात का संकेत है कि जमीन और वन अधिकारों से जुड़ी समस्याएं गंभीर हैं। इनका समाधान समय रहते होना जरूरी है। उन्होंने प्रशासन से पांच सूत्रीय मांगों पर गंभीरता से विचार करने और तय समयसीमा में कार्रवाई सुनिश्चित करने की अपील की। कुंजाम ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ग्रामीणों की समस्याओं को नजरअंदाज किया गया और मांगों का निराकरण नहीं हुआ, तो आने वाले समय में इससे भी बड़ा जन आंदोलन किया जाएगा।
नक्सल प्रभावित सुकमा में लोकतांत्रिक लामबंदी बनी चर्चा का विषय
सुकमा में हजारों ग्रामीणों का एक साथ जिला मुख्यालय पहुंचना केवल जमीन और वन अधिकारों से जुड़ा प्रदर्शन नहीं, बल्कि जिले में बदलते सामाजिक और राजनीतिक माहौल का भी संकेत माना जा रहा है। नक्सलवाद के प्रभाव से बाहर निकलकर विकास और लोकतांत्रिक गतिविधियों की ओर बढ़ रहे क्षेत्र में ग्रामीणों का इस तरह संगठित होकर अपनी मांगें रखना महत्वपूर्ण है। अब सबकी नजरें जिला प्रशासन और राज्य सरकार पर हैं कि पांच सूत्रीय ज्ञापन में उठाए गए मुद्दों पर क्या कार्रवाई होती है और प्रभावित ग्रामीण परिवारों को कब तक राहत मिलती है।



