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छत्तीसगढ़ की अनोखी परंपरा, जहां शादी को वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी के जरीए नहीं स्मारक या लकड़ी का स्तंभ लगाकर रखते हैं याद

बिगुल
आज के डिजिटल दौर में जहां शादियों की यादों को संजोने के लिए हाई-टेक वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी का सहारा लिया जाता है, वहीं बस्तर के एक सुदूर गांव में सदियों से एक ऐसी परंपरा चली आ रही है, जो तकनीक को नहीं, बल्कि जड़ों को प्राथमिकता देती है.

​उत्तर बस्तर के कोयलीबेड़ा क्षेत्र के कागबरस, चीलपरस, गुंदुल गांव क्षेत्र में विवाह के उपरांत एक ऐसी अनूठी रस्म निभाई जाती है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ‘अमिट निशानी’ बन जाती है. बिना किसी कैमरे और रील के, यहां के आदिवासी अपनी शादियों को यादगार बनाने के लिए ‘स्मृति’ तैयार करने का एक ऐसा तरीका अपनाते हैं, जो न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है, बल्कि पूरी तरह से अनोखा भी है. आइए जानते हैं आखिर क्या है कागबरस गांव की यह खास परंपरा जो आज भी आधुनिकता की चकाचौंध से दूर अपनी पहचान बनाए हुए है.

यहां स्मारक या लकड़ी का स्तंभ लगाकर शादी रखते हैं याद
आदिवासी बाहुल्य उत्तर बस्तर कांकेर जिले के कागबरस, गुंदुल, चिलपरस गांव की जोकि जिला मुख्यालय से लगभग 140 किलोमीटर दूर कोयलीबेड़ा ब्लॉक में जंगलों से घिरा हुआ है. यहां के ग्रामीण आदिवासी परंपरा के अनुसार शादी विवाह के संपन्न होने के बाद यहां के ग्रामीण लकड़ी का बड़ा सा स्मृति चिन्ह बनाकर अपने घरों के सामने गड़ा देते है. ऐसा ही कागबरस गांव के एक आंचला परिवार के लोग विवाह की स्मृति चिन्ह के रूप में अपने घर के बाहर एक स्तंभ लगाए हुए है ताकि उस स्मारक को उनकी आने वाली पीढ़ी देख सके.

स्थानिय ग्रामीण बताते है कि स्मारक या स्तंभ लगाने की परंपरा आदिवासी समुदाय का शुरू से ही रहा है मृत्यु के पश्चात पत्थर गाड़ कर स्तंभ बनाने का हो या शादी के बाद यह स्मृति स्तंभ हो साथ ही उन्होंने आगे बताया की यह स्तंभ दरअसल विवाह के समय मड़वा मंडप में लगाया जाता उस का बीच का भाग होता है जिसे स्थानीय भाषा में मांडो कहा जाता है जिसे विवाह संपन्न होने के बाद स्मृति चिन्ह के रूप में घरों के बाहर लगाया जाता है.

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