साहित्य

राखी के पीछे छिपी हैं ये पौराणिक कथाएं, पढ़ें रक्षासूत्र से जुड़े 5 रोचक प्रसंग

बिगुल
रक्षाबंधन 2026: भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प का पर्व रक्षाबंधन हर साल सावन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और उनके सुखद, स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन की कामना करती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा की शुरुआत आखिर कैसे हुई? धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित कथाओं में इससे जुड़े कई रोचक प्रसंग मिलते हैं। रक्षाबंधन को केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने तक सीमित नहीं माना जाता। भारतीय परंपरा में रक्षा सूत्र प्रेम, विश्वास, जिम्मेदारी और एक-दूसरे की सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक रहा है। देवासुर संग्राम से लेकर भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी तक, कई कथाएं इस परंपरा के अलग-अलग रूपों को सामने रखती हैं।
देवासुर संग्राम में इंद्राणी ने इंद्र को बांधा रक्षा सूत्र

रक्षाबंधन से जुड़ी एक प्राचीन धार्मिक मान्यता देवताओं और असुरों के बीच हुए युद्ध से संबंधित है। कथा के अनुसार, युद्ध में असुरों का प्रभाव बढ़ने लगा था और देवराज इंद्र के सामने भी गंभीर संकट खड़ा हो गया था। ऐसे समय में इंद्राणी यानी शची ने भगवान विष्णु की आराधना की। धार्मिक मान्यता के अनुसार, उन्होंने मंत्रों से पवित्र किए गए रक्षा सूत्र को इंद्र की कलाई पर बांधा। इसके बाद इंद्र का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने युद्ध में देवताओं का नेतृत्व करते हुए विजय प्राप्त की। यह प्रसंग रक्षा सूत्र को संकट से सुरक्षा और विजय के प्रतीक के रूप में देखने वाली मान्यता से जुड़ा है।
यमराज और यमुना की कथा

रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध कथा सूर्यदेव की पुत्री यमुना और उनके भाई यमराज से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, यमुना लंबे समय से अपने भाई यमराज के आने की प्रतीक्षा कर रही थीं। जब यमराज उनके घर पहुंचे तो यमुना ने पूरे स्नेह और श्रद्धा के साथ उनका स्वागत किया। उन्होंने पूजा-अर्चना की और अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। यमुना के प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो भाई अपनी बहन से राखी बंधवाता है और इस पर्व को श्रद्धा से मनाता है, उसे दीर्घायु और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी कथा के कारण रक्षाबंधन को कई जगह यम-यमुना के पवित्र भाई-बहन संबंध से भी जोड़ा जाता है।
माता लक्ष्मी और राजा बलि का भाई-बहन का रिश्ता

राखी से जुड़ी एक लोकप्रिय कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से संबंधित है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। बाद में बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनके साथ रहने का वचन दिया। भगवान विष्णु के लंबे समय तक बैकुंठ नहीं लौटने पर माता लक्ष्मी चिंतित हुईं। कथा के अनुसार, उन्होंने एक सामान्य महिला का रूप धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचीं। वहां उन्होंने बलि को रक्षा सूत्र बांधकर भाई बना लिया। जब राजा बलि ने बहन से उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को उनके साथ बैकुंठ भेजने का अनुरोध किया। राजा बलि ने बहन की इच्छा का सम्मान किया और भगवान विष्णु को वापस जाने की अनुमति दे दी। यह कथा बताती है कि राखी का रिश्ता केवल जन्म से नहीं, बल्कि विश्वास और आत्मीयता से भी बन सकता है।

द्रौपदी और श्रीकृष्ण का रक्षा बंधन

महाभारत से जुड़ी द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण की कथा रक्षाबंधन के सबसे लोकप्रिय प्रसंगों में शामिल है। प्रचलित कथा के अनुसार, एक अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लग गई और उससे रक्त निकलने लगा। द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक हिस्सा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया। द्रौपदी के इस स्नेह और समर्पण से श्रीकृष्ण अत्यंत भावुक हुए और उन्होंने उनकी रक्षा करने का संकल्प लिया। बाद में कौरव सभा में जब द्रौपदी का अपमान करने का प्रयास हुआ, तब धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण ने उनकी लाज की रक्षा की। इसी वजह से यह प्रसंग भाई-बहन के पारंपरिक रिश्ते से आगे बढ़कर निःस्वार्थ प्रेम और रक्षा के वचन का प्रतीक माना जाता है।

रानी कर्णावती और हुमायूं की चर्चित कहानी

रक्षाबंधन से जुड़ा एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक लोकप्रसंग मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं से संबंधित है। लोकप्रिय कथा के अनुसार, गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के चित्तौड़ पर हमले के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी थी। कहा जाता है कि राखी को भाई-बहन के रिश्ते के प्रतीक के रूप में स्वीकार करते हुए हुमायूं ने रानी की मदद करने का प्रयास किया। हालांकि, इस पूरे प्रसंग के ऐतिहासिक प्रमाणों और इसकी घटनाओं को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं। इसलिए इसे पक्के ऐतिहासिक तथ्य के बजाय प्रचलित ऐतिहासिक लोककथा के रूप में देखना अधिक उचित है। फिर भी यह कहानी रक्षाबंधन के उस भाव को दर्शाती है जिसमें रक्षा और विश्वास की भावना सामाजिक तथा धार्मिक सीमाओं से आगे निकल जाती है।

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