बालोद विवाद : आदिवासियों की मूल संस्कृति’ को बदलने की सुनियोजित साज़िश सामने आई, स्वार्थ के लिए तय किया जा रहा है राजनैतिक नैरेटिव, एक स्पेशल रिपोर्ट

बिगुल
बालोद का ताजा विवाद की सबसे गहरी और चिंताजनक परत यह है कि इसके पीछे ‘मूल आदिवासी संस्कृति’ को ही बदलने का एक सुनियोजित खेल चल रहा है। ‘गोंडवाना गणतंत्र पार्टी’ और ‘सर्व आदिवासी समाज’ के कुछ स्वयंभू नेता खुद को पारंपरिक रूढ़िवादी संस्कृति का रक्षक बताते हैं। लेकिन जब हम स्थानीय जानकारों और बुजुर्गों की बात सुनते हैं, तो एक कड़वा सच सामने आता है। परंपरा को बचाने के नाम पर ये आधुनिक नेता आदिवासी समाज पर नई-नई मनगढ़ंत परंपराएं, नए नारे और नए देवता थोप रहे हैं।
यह प्राचीन, सनातन और मूल गोंड संस्कृति की जड़ों को काटकर एक नया, कृत्रिम और राजनैतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश है, ताकि आदिवासी समाज को उनकी ऐतिहासिक और पारंपरिक पहचान से पूरी तरह अलग किया जा सके।
पारंपरिक गोंड संस्कृति बनाम थोपा जा रहा नया एजेंडा
इस वैचारिक घालमेल और सांस्कृतिक खिलवाड़ को हम निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के जरिए गहराई से समझ सकते हैं:
- ऐतिहासिक सच: गोंड राजाओं और प्राचीन तीर्थों में मूर्ति पूजा का इतिहास
आज के कुछ नए नेता यह नैरेटिव फैलाते हैं कि आदिवासी समाज में मूर्ति पूजा की परंपरा नहीं रही है, लेकिन यह दावा पूरी तरह से इतिहास के खिलाफ है।
• हजारों साल पुराना इतिहास: स्थानीय बुजुर्गों और गोंड संस्कृति के शोधकर्ताओं का स्पष्ट मानना है कि गोंड राजाओं के शासनकाल से ही, और समाज के प्राचीन तीर्थ स्थानों में हजारों साल से सभी देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित रही हैं।
• ऐतिहासिक प्रमाण: गढ़ा मंडला से लेकर बस्तर और रतनपुर के गोंड राजवंशों के इतिहास को देखें, तो उन्होंने हमेशा भव्य मंदिरों और मूर्तियों का संरक्षण किया। आज अचानक मूर्तियों का विरोध करना दरअसल पूर्वजों की समृद्ध विरासत और इतिहास को नकारने जैसा है। - ‘गौरी-गौरा’ और पारंपरिक तीज-त्योहारों से दूरी बनाने की साजिश
छत्तीसगढ़ का लोक पर्व ‘गौरी-गौरा’ (भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह उत्सव) सदियों से गोंड समाज की आत्मा रहा है। दीपावली के समय गोंड समाज के लोग ही पूरी श्रद्धा, नियम और लोक-परंपरा के साथ गौरी-गौरा की मिट्टी की मूर्तियां बनाते हैं, उनकी पूजा करते हैं और विसर्जन करते हैं। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि गोंड संस्कृति हमेशा से व्यापक सनातन समाज का एक अभिन्न हिस्सा रही है। लेकिन आज राजनीतिक लाभ के लिए नए नेता युवाओं को इन पारंपरिक त्योहारों से दूर रहने की पट्टी पढ़ा रहे हैं, जो समाज के सांस्कृतिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है। - ‘सेवा-सेवा’ और शिवलिंग के नए स्वरूपों को थोपना
परंपरा को बचाने का ढोंग करने वाले ये संगठन आज समाज के भीतर एक नया और अजीब घालमेल पैदा कर रहे हैं:
• कृत्रिम बदलाव: पारंपरिक गोंड संस्कृति के मूल स्वरूप को बदलकर, ‘सेवा-सेवा’ के नए किस्म के नारे और शिवलिंग के ऐसे नए रूप-स्वरूपों को जबरन थोपा जा रहा है जो कभी आदिवासियों की मूल रूढ़ि-परंपरा का हिस्सा थे ही नहीं।
• पहचान का संकट: इस कृत्रिम बदलाव का एकमात्र उद्देश्य आदिवासी समाज को उनकी मूल जड़ों से काटकर एक अलग पहचान देना है, ताकि उन्हें एक वोट बैंक के रूप में आसानी से इस्तेमाल किया जा सके। इस प्रक्रिया में सदियों पुरानी वास्तविक गोंड संस्कृति विकृत हो रही है। - बुजुर्गों की चिंता: नई पीढ़ी में भटकाव
गांवों के सयाने और बुजुर्ग इस बात से बेहद चिंतित हैं कि राजनीति से प्रेरित ये संगठन नई पीढ़ी के आदिवासी युवाओं को भ्रमित कर रहे हैं। जो युवा अपनी वास्तविक लोक-परंपराओं को ठीक से जानते भी नहीं, उन्हें उग्र भाषा और नए प्रतीक देकर समाज के ही स्थापित बुजुर्गों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है। परंपरा की आड़ में यह राजनीतिक प्रयोग आने वाले समय में आदिवासी समाज के भीतर ही गहरा सांस्कृतिक और सामाजिक संकट पैदा कर देगा। - बालोद का विवाद सिर्फ जमीन के एक टुकड़े का नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि कैसे कुछ संगठन अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए एक पूरी प्राचीन संस्कृति के मूल स्वरूप को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। रूढ़ि-परंपरा के नाम पर किया जा रहा यह घालमेल वास्तविक गोंड संस्कृति को बचाने के लिए नहीं, बल्कि उसे राजनैतिक रूप से हाईजैक करने का जरिया बन चुका है।




